मंगलवार, 3 मार्च 2020

कब्बू के किश्तों में बच्चें

पहली बार हमने  किसी बिल्ली को किश्तों में बच्चे देते देखा ... 

कब्बू 


सीधी सादी, सबसे डर के रहने वाली नन्ही सी   कब्बू अचानक पेट फूला कर घूमने लगी तब हमें लगा कि ये तो बड़ी हो गई। अब हमारे सामने समस्या उसके बच्चे सुरक्षित जगह पर करवाने की थी। क्योंकि ये तो ठहरी बिल्ली की जात,  कहां अपने लिए प्रसव स्थल बना लेगी कुछ ठीक नहीं।  इधर - उधर घूमने वाली बिल्ली उसे हम बांध कर तो रख नहीं सकते  थे फिर भी कोशिश रहती कि उस पर हम नजर रखे। लेकिन कब्बू तो समझदार बच्ची ठहरी,  अपना अच्छा - बुरा बखूबी जानती थी अतः जब उसे महसूस हुआ कि प्रसव पीड़ा से गुजरने वाली है तो सबसे पहले उसने खाना छोड़ा।  ये देखकर हमने प्रिंटर के बड़े से डब्बे में  दो चद्दर बिछा कर उसके लिए नरम बिस्तर बना कर उसे सुला दिया। कब्बू भी अपना नया घर पाकर खुश हो गई।


एलियन शक्ल का बच्चा 

 दो दिन बाद 9 फ़रवरी 2020  को उसने लगभग 9 बजे एक एलियन से दिखने वाले बच्चे को जन्म दिया। वो बच्चा मरा पैदा हुआ था। शरीर में कोई हरकत नहीं थी। कब्बू ने उसे दो - चार बार चाटा जैसे ही उसे समझ आया कि बच्चा मरा है उसने उससे दूरी बनाई और खुद को साफ करने लगी। बिल्लिया  स्वभाव से सफाई पसंद होती है और अनुशासित भी। वो जबरदस्ती  दूसरी बिल्लियों से झगड़ा नहीं करती। स्वयं को साफ करने के बाद वो मेरे पास आकर चिपक कर बैठ गई। ये देखकर हमे बड़ा आश्चर्य हुआ । हमने उठ कर सबसे पहले उस मृत बच्चे को हटाया। कब्बू ने हमें शांति से  देखा और निढ़ाल सी पड़ गई।  उसकी स्थिति देखकर हमें उस पर बहुत तरस आया। हमने उसे दूध हलका गरम कर के दिया जो उसने थोड़ा सा पिया और फिर सो गई। दूसरे दिन भी उसने कुछ नहीं खाया।  जानवर अपने शरीर की जरूरतों और उसके उपचार के बारे में भली प्रकार से जानते है अतः उन्हें कितना भी चिकीन, मटन, मिठाई, दूध दे दो वो उतना ही खाएंगे जितनी उन्हें जरूरत है। हम इंसानों की तरह वे कल के लिए नहीं सोचते शायद उन्हें ईश्वर  के ऊपर  अथाह भरोसा है। उसके  पेट को छूने से समझ आ रहा था कि अभी इसके और बच्चे है लेकिन हमें आश्चर्य हो रहा था कि अगर बच्चे है तो वो जनम क्यों नहीं ले  रहे।  तीन दिन बाद 12 फ़रवरी को सुबह से ही वो बार - बार आकर मेरी गोद में बैठ जाती और कातर स्वर में रोती। रात्रि 7बजे उसने फिर से एक बच्चे को जन्म दिया, उसके 15 मिनट बाद दूसरे को जो की मृत पैदा हुआ। फिर तीसरा और चौथा। इस तरह अत्यंत वेदना सह कर वह तीन बच्चों की मां बन गई। अब उसकी ये स्थिति थी कि अगर हम बच्चे को ले लेते तो वो तुरंत व्यथित सुर निकालती जैसे कह रही हो कि मेरे नन्हे को तंग मत करो। जैसे ही हम उसे उसके पास रखते वो उसे चाट - चाट कर अपनी सारी ममता उड़ेल देती। उसकी ये हालत देख कर हमे उस पर बड़ी दया आती और ऊपरवाले  द्वारा मां के  रूप में नन्हे जीवों को  दिए हुए  इस करिश्माई उपहार पर विस्मय होता कि  उसने क्या इंसान क्या जानवर सभी को ममत्व का अनमोल गुण दिया है। सच में मां, मां ही होती है।
प्रसव पीड़ा से व्यथित कब्बू 


माँ बनने का सुकून 

शैतान बच्चा 





मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

अगला पल, और नन्ही सी जान


अगले पल, क्या ?



कल्ली डोरमैट पर एक नन्हे से बच्चे को लेकर बैठी थी, दरवाजा खुलते ही उसने हमको देखा और बड़े ही कातर स्वर में आवाज निकाली जैसे कहना चाह रही हो कि ये उसके जिगर का टुकड़ा है। बच्चे का निश्चल शरीर देखकर पलभर को लगा कि क्या ये बच्चा जीवित है?  2 -4 मिनट इंतजार करने के बाद कल्ली ने अपने बच्चे को मुंह से पकड़ा और लेकर चली गई।
कल्ली और उसका बच्चा आयी - गई बात हो गई। सहसा 21 जनवरी को कल्ली अपने 15 दिन के बच्चे को लेकर फिर से हाजिर हो गई दोनों मां - बच्चा मुख्य द्वार के डोरमैट पर बैठे हुए थे। उस  नन्हे से बच्चे को देखकर हमें बहुत खुशी हो रही थी लेकिन हाथ लगाने से डर रहे थे कि कहीं  कल्ली अपने बच्चे को छोड़ न दे ( जैसा  कि बिल्लियों के बारे में सुनते है ) लेकिन वो नन्ही सी जान अपनी मां के पास से सरक कर दूसरी सीढ़ी पर जा टिकीं। कल्ली अपने बच्चे को ठंड के समय सीढ़ी पर पड़े देख मेरी तरफ मुड़ी और शिकायती लहजे में रोई जैसे कह रही हो मेरा बच्चा सर्दी में मर जाएगा। उस नन्ही जान को हमने जब   अपने हाथों में उठाया तो मेरी सारी ममता उमड़ पड़ी उसे दिल से लगाकर कितनी खुशी मिली ये शब्द बयान नहीं कर सकते थे। ऊपर  सीढ़ी के एक कोने में मोटा वाला डोरमैट बिछा कर   बच्चे और उसकी मां को रख दिया । अब कल्ली खुश थी और उसका बच्चा भी। भोली एवम् दृष्टा ( कुत्ते) यू तो जितनी बिल्लियां रहती है उनसे परिचित है। उठना - बैठना, खाना एक संग ही होता है किन्तु मां बनी बिल्ली ये कैसे विश्वास कर ले की ये उसके बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। अतः वो इन्हे देखते ही अपने रौद्र रूप में आ जाती और ये कुत्ता प्रजाति के रूप में लेकिन फिर भी कल्ली आश्वस्त थी की उसका बच्चा सुरक्षित है।  भोली , दृष्टा अगर उसके पास जाती तो कल्ली इंसानों की तरह से उनके झापड़ लगाती। मेरी कोशिश ये रहती की ये मेरे संग छत पर जाए और मेरे संग ही वापस आए। एक बार तो मेरी बात न मानने पर दोनों ने हमसे मार भी खाई जिसमें भोली को अगर जोर से डांट दे तो वो सहम जाती है लेकिन दृष्टा में इतना बचपना है कि मार खाने के बाद भी वो अपनी मर्जी का करती है। पूरा एक दिन निकल गया जच्चा - बच्चा दोनों ही स्वस्थ थे। रात के नौ बजे हम एक कार्यक्रम से लौटे तो देखते है कि चैनल गेट के पास कल्ली का बच्चा पड़ा है और भोली उसके पास खड़ी उसे चाट रही है। उस छोटी सी बच्ची के लिए भोली का ये प्यार ही बहुत घातक था। इस दृश्य ने मुझे अत्यन्त क्रोधित कर दिया। सबसे पहले हमने बच्चे को उठाया और फिर  भोली को बहुत कस के डांटा कि तुम बच्चा ऊपर से लेकर नीचे कैसे आई तुम्हे छूने के लिए मना किया था न। तत्पश्चात पूरे परिवार को आड़े हाथो लिया कि तुम लोग मुख्य द्वार बंद करके बैठे हो और ये भोली बाहर बिल्ली के बच्चे को ऊपर से उठा लाई। भोली के कारण सुन्न हुए बच्चे में अब तक जान आ गई और वो अपनी मासूम आवाज में रोने लगी। उस समय रात्रि के साढ़े नौ बजे थे। हमने उसे  और उसकी मां को गोद में उठाकर उनके बिस्तर तक पहुंचा दिया और थोड़ी देर रुक कर इंतजार  करने लगे कि कल्ली इसके साथ क्या व्यवहार करती है   (मन तो मेरा कर रहा था की इसे अपने कमरे में जगह दे दे फिर ख्याल आया कि वैसे ही  मुझे बिल्ली के परिवार से जोड़ा जाता है, क्योंकि एक बार मायापुर में एक बिल्ली जो गर्भ से  थी हमें देखकर इतनी कातर आवाज में रोई  कि उसका रोना देखकर हम तुरंत समझ गए कि ये  बहुत भूंखी है हमने  उसे लड्डू खरीद कर खिलाया जिसे देखकर सबने मेरा मजाक उड़ाना आरंभ कर दिया)   देखा कि कल्ली इसे चाट रही है ( बिल्ली, कुत्तों के दुलार का तरीका)  तब हम अपने सीटिंग जोन में आकर फिर से बैठ गए जहां  हमारे दोनों बेटे, बेटी,  बहू सभी मिलकर गप - शप कर रहे थे।  10 बजे हमने उठकर अपने प्यारे बच्चों को दुबारा चिकिन दिया और मुख्य द्वार बंद कर लिया ताकि भोली - दृष्टा बिल्लियों के चिकिन को ना खा जाए। रात साढ़े दस पर सुमंत ( हेल्पर) आया तो मेरे मन में ख्याल आया कि  क्यों न कल्ली और उसके बच्चे को देख कर आए कि वो क्या कर रहे है हमने ये बात सबके सामने जैसे ही बोली कि सुमंत बोल पड़ा - " बिल्ली का बच्चा तो मरा पड़ा है, कोई उसको खा गया।" ये सुनते ही हम तुरंत मुख्य द्वार खोल कर सीढ़ी की तरफ आए तो देखा कि वो मासूम दो टुकड़ों में पड़ा हुआ है, देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने धारदार हथियार  से एक झटके में उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी हो। इस मार्मिक दृश्य ने मेरे  हृदय को विचलित कर दिया एक घंटे पहले वो मेरी गोद में था और कहा ये कटा मृत शरीर। सवाल था कि इतनी निर्मम हत्या उसकी की किसने। रात  हो या दिन  कोई  भी पांच तल्ले चढ़ कर बिल्ली का बच्चा मारने नहीं आएगा। अगर बिल्ले ने मारा तो ऐसे कैसे मारा की सर और धड़ दोनों अलग हो गए। और  एक भी बिल्ली ने मुंह से आवाज नहीं निकाली जबकि उसकी मां कल्ली जहां बच्चा मरा पड़ा था उस जगह से चार सीढ़ी  ऊपर बैठी थी और दो बिल्लियां नीचे वाली सीढ़ी पर। बिल्लियों की आदत होती है कि अगर उनका कोई बच्चा बहुत कमजोर है या उसे किसी अजनबी ने छू लिया तो वो उसे छोड़ देती हैं। इधर  दोनों कुत्ते जो जरा सी आहट पर पूरी बिल्डिंग सर पर उठा लेते है, यहां एक मासूम सी जान खत्म हो गई और इन्हे तनिक भी हवा नहीं लगी  और न ही हम लोगो को जो चंद कदमों के फासले पर थे। जो भी हो ये अगला पल बड़ा ही रहस्यमई होता है क्या इंसान क्या जीव - जंतु कोई नहीं जानता कि आने वाला अगला पल उसके लिए क्या सौगात लाएगा।  मन बहुत ही दुखी था लेकिन बस में कुछ नहीं।  आज सुबह  से ही कल्ली अपने बच्चे को खोज रही है और बार - बार  मेरे आगे - पीछे घूम रही है जब हम  उसे प्यार से पुचकारते तब  वह मुंह खोल कर निरीह आवाज निकालती  जैसे पूछ रही हो कि बड़े विश्वास के साथ तुम्हारे पास आए थे और तुम उस विश्वास को रख भी न सकी।



बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

Bholi

आखिर भोली माँ बन गयी


भोली के सात  नवजात बच्चे 

भोली मां बनने वाली है ये ख्याल ही मन को पुलकित कर जा रहा था डाक्टर ने 21 सितम्बर डिलीवरी डेट बताई थी। हम सभी उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे जब  4  पैर वाले नन्हे - मुन्ने बच्चे घर में घूमेंगे।  लेकिन एक समस्या थी जिसके लिए हमने पहले सोचा नहीं किन्तु जैसे - जैसे दिन पास आ रहे थे वैसे - वैसे चिंता बढ़ने लगी क्योंकि 16 सितंबर को हमें तिरुपति जाना था और वापसी 22 सितंबर तक होनी थी। घर में भोली का ख्याल रखने के लिए बेटा - बहू थे लेकिन  उनकी शादी हुए ही बहुत कम दिन हुए थे अतः उन्हें बच्चे पैदा करवाने का कोई अनुभव नहीं था। जबकि ऐसी स्थिति में ये समझना अत्यंत आवश्यक था कि कब लेबर पेन उठना आरंभ होगा और कब डाक्टर को खबर करके बुलाना होगा। यू तो डाक्टर को पूरी स्थिति से अवगत करा दिया था फिर भी मानसिक दबाव था। बाहर जाने से पहले हमने भोली से कहा कि " भोली जब तक हम वापस न आ जाए तब तक तुम बच्चे मत देना।" शायद भोली मेरी मनोस्थिति समझ चुकी थी उसने एक आज्ञाकारी बच्ची की तरह मेरे आग्रह का पूर्णतया पालन किया और जब हम 22 को वापस आ गए उसी रात से उसे लेबर पेन आना आरंभ हो गया। डाक्टर को खबर दी उसने कम्पाउन्डर भेज दिया। जिसने आते ही भोली को ड्रिप लगाई और दर्द बढ़ाने की दवाई दी। एक तो भोली की प्रथम प्रसव पीड़ा ऊपर से तीन - तीन लड़कों को देखकर उसका दर्द गायब हो जा रहा था। हमने कम्पाउन्डर को समझाया 22 सितंबर की रात 10 बजे से भोली प्रसव वेदना से परेशान है और 23 की रात हो गई यानी की 24 घंटे हो चुके है तुम लोग उसको अकेले छोड़ दो,  जानवर है तो   क्या      
उसे भी शर्म लगती है। अकेले रहेगी वो ठीक बच्चा दे देगी। लेकिन कम्पाउन्डर  महोदय सुनने को ही तैयार नहीं, उनकी दलील कि मैंने कितने जानवरों की डिलीवरी करवाई है। भोली की हालत हमसे देखी नहीं जा रही थी लेकिन कुछ कर नहीं सकते थे । आज 24 सितम्बर की सुबह ही बेटे ने डाक्टर को फोन किया और भोली की वर्तमान स्थिति से अवगत कराया। डाक्टर ने उसे चेंबर लाने के लिए कहा। बेचारी भोली प्रसव पीड़ा के दौरान सफारी में बैठकर 15 किलोमीटर दूर डाक्टर के चेंबर में जब तक पहुंचती है तब तक उसका पहला बच्चा  गाड़ी में ही हो गया। दूसरा डाक्टर के चेंबर में। डाक्टर साहब ने उसे इतनी बुरी स्थिति में चेंबर में बुलवाया था इसलिए नहीं कि वे उसकी तकलीफ से द्रवित थे  बल्कि  उनके मन में तो कुछ और ही चल रहा था।  उन्होंने सुझाव दिया कि इसके 7 - 8 बच्चे होंगे और वे कम से कम 12 घंटे ले लेंगे, हम इतनी देर इंतजार नहीं कर सकते अतः अच्छा होगा कि इसका आप्रेशन कर दे ताकि बच्चे भी जल्दी हो जाए और इसे तकलीफ से भी मुक्ति मिल जाएगी। बेटा असमंजस की स्थिति में था उसने हमे फोन करके पूछा कि क्या करना चाहिए। हमने आप्रेशन के लिए सख्ती से मना कर दिया। हमे डाक्टर के इस प्रस्ताव पर अत्यंत क्रोध आ रहा था कि अत्यधिक पैसे कमाने की चाह ने इंसान को कितना संवेदनहीन बना दिया है। अभी तक महिलाओं के आप्रेशन के बारे में सुनते थे अब जानवरों के भी आप्रेशन से बच्चे होंगे।  ईश्वर ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा इसी लिए उसने जनने की विधि भी इस प्रकार बनाई की जितनी तकलीफ है बच्चे के पैदा होने के समय तक  ( प्रसव  पीड़ा मादा को मां बनाती है और उसे अपने बच्चे से जोड़ कर रखती अन्यथा बिना दर्द के पैदा होने वाले बच्चे मां के लिए महत्व ही नहीं रखेगे)  उसके बाद  मां स्वयं सक्षम हो जाती है अपने बच्चे की देख - रेख करने के लिए जबकि आप्रेशन से बच्चा पैदा होने के बाद मां की इतनी बुरी स्थिति हो जाती है कि वो महीनो तक स्वस्थ नहीं हो पाती।  यहां भोली कोई इंसान नहीं वरन् एक मूक पशु है जो अपनी तकलीफ बता भी नहीं पाती। अब तक भोली अपने दो बच्चों के साथ 108 सीढ़ियां चढ़ कर घर वापस आ गई। बार - बार होने वाली प्रसव वेदना और घर से डाक्टर के चेंबर, चेंबर से घर वापसी ने उसे निढाल कर दिया। किन्तु अपने दो नन्हे - मुन्नो को देखने की खुशी उसकी आंखों की चमक से जाहिर हो रही थी। रात 8 बजे तक सात बच्चे जन्म ले चुके थे जिनमें तीन मादा और 4 नर थे। बच्चे देखकर हम लोगो ने राहत की सांस ली कि अब भोली चैन से  खाएगी और सोएगी। लेकिन नई - नई मां बनी भोली अपने बच्चों को दुलराने में व्यस्त उसे ये भी समझ नहीं आ रहा कि उन्हें  दूध भी पिलाना है। हमने एक - एक बच्चे को पकड़ कर भोली की निप्पल से लगाया तो सब चुकुर चूकुर अपनी मां का दूध पीने लगे सिवाय एक मादा बच्ची के। इधर हमने गौर किया कि भोली कुछ खा नहीं रही है। दूसरी रात्रि यानी की ठीक 24 घंटे बाद भोली ने आठवें  मरे बच्चे को जन्म दिया।  उस बच्चे को भोली  की नजर से बचाकर हटा दिया वो बेवकूफ बच्चे गिनना तो जानती नहीं थी अतः उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन ये  देखकर  मेरा मन द्रवित हो गया  कि बेचारी भोली ने कितना नरक झेला है इस ममत्व को पाने के लिए। 


रविवार, 8 सितंबर 2019

KUFFU, 'I am SO SWEET': Bholi n Drishta at Jhakdi Fall in Gangtok

KUFFU, 'I am SO SWEET': Bholi n Drishta at Jhakdi Fall in Gangtok: भोली और दृष्टा  झाकड़ी फॉल में,  दृष्टा और भोली  हम लोगों ने जब गंगटोक  घूमने की योजना बनायीं तो हमारे साथ हमारे दो पालतू बच्चे भोली औ...

Bholi n Drishta @ Ban Jhakdi Fall in Gangtok

भोली और दृष्टा   बन झाकड़ी फॉल में, 
दृष्टा और भोली 

हम लोगों ने जब गैंगटॉक  घूमने की योजना बनायीं तो हमारे साथ  चार पैर वाले  दो पालतू बच्चे भोली और दृष्टा भी थे।  वहां हम लोग अपनी गाड़ी का उपयोग कर नहीं सकते थे क्योंकि गंगटोक में इसकी इजाजत नहीं है, अतः हमने स्थानीय गाड़ियों का इंतजाम किया  और निकल पड़े भ्रमण के लिए। गाड़ी ड्राइवर,  गंगटोक के सभी दर्शनीय स्थल दिखाने के बाद अंत में हमें बन -झाकड़ी जल प्रपात ले गया ये पहाड़ों की तलहटी में  घने जंगलों के बीच काफी ऊंचाई से तीर्व गति से गिरने वाला जल  प्रपात है  यहां शाम के पांच बजे के बाद कोई भी नहीं रुकता क्योंकि जंगली जानवरों का डर रहता है  लेकिन हमारे बेटों को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी और वे भोली दृष्टा को गाड़ी से निकाल कर झाकड़ी फॉल ले आये. तीर्व बारिश में भीगते हुए दोनों हम लोगो के पास पहुंचकर बहुत  खुश हो रहे थे. अब वहां उन्हें देखने वालों की भीड़ एकत्रित हो गयी. लोग अपने बच्चों को लाकर उनसे मिलवाते  खुद भी उनके साथ फोटो खिचवानें की इच्छा जाहिर करते।  विदेशी सैलानी उनके साथ हाथ मिलाने की चेष्टा करते।  ये सब हम सभी को बहुत आनंदित कर रहा था।
दृष्टा -भोली के साथ 

बन झाकड़ी व् उसकी  पत्नी राक्षसी की मूर्ति 

दृष्टा - भोली 


गैंग टोक की तलहटी के घने जंगल में सौ फीट की ऊंचाई से तीर्व गति से गिरने वाला बन झकडी फॉल अत्यंत मनोरम स्थल है इसे लिविंग पार्क या रिक्रिएशन सेंटर भी कहा जाता है। बन का मतलब जंगल या फॉरेस्ट जबकि झकडी का मतलब बीमारियों को ठीक करने वाला यानी की तांत्रिक, हीलर। टैक्सी चालक ने हमें बताया कि झकडि गांवों से बच्चे चुरा कर लाते है और गुफाओं में जहां साधना करते है वहीं उन्हें प्रशिक्षित करते है। साल , छः महीने के बाद उन्हें उनके घर छोड़ देते है जहां वे बच्चे अपने गांव के निवासियों का इलाज करते है । स्थानीय लोगो का उनके ऊपर इतना विश्वास होता है कि पहले रोगी को झकडी के पास ही ले जाएंगे। टैक्सी चालक ये बताते हुए बहुत दुखी हो रहा था कि उसके गांव में रहनेवाला झकडी मर गया। इसके साथ ही उसने अत्यंत दिलचस्प बात बताई कि गुफाओं में रहने वाले झकडी की पत्नी राक्षसी होती है जो लाए हुए बच्चे को खाने की कोशिश करती है लेकिन झकडी उस बच्चे को छुपा कर रखता है। इस किवदंती की गवाह बनी मूर्तियां वहां बने पार्क में स्थापित है।

 शुभ्रांशु -शौर्यंक एवं भोली -दृष्टा 

बन झकड़ी के दर्शनीय स्थल 
पर सैलानियों के साथ 

बन झकड़ी जल प्रपात का दृश्य 

सिक्किम के नामची चारधाम में 



गुरुवार, 7 जून 2018

KUFFU, 'I am SO SWEET': तुम्हे भूल नहीं पाएंगे कुफ्फु

KUFFU, 'I am SO SWEET': तुम्हे भूल नहीं पाएंगे कुफ्फु:  बहुत याद आती हो कुफ्फु  चेरापुंजी के जलप्रपात  नोहकलिकाई में  कुल्फी और शकुन त्रिवेदी  आज सुबह हमे ताजा चेनल  के सागर मंथन में भ...

तुम्हे भूल नहीं पाएंगे कुफ्फु

 बहुत याद आती हो कुफ्फु 

चेरापुंजी के जलप्रपात  नोहकलिकाई में  कुल्फी और शकुन त्रिवेदी 


आज सुबह हमे ताजा चेनल  के सागर मंथन में भाग लेने जाना था ,उसके बाद हमे अपनी मित्र के साथ अक्षरधाम मंदिर (जोखा) पहुचना  था ,जहा से वापस आते-आते रात्रि का नौ बज जाता। जाते समय हम जल्दी में थे कुल्फी जोर -जोर से हाफ रही थी और मेरी तरफ देख रही थी। ये देखकर मेरा मन खिन्न हो गया , हमने मन ही मन सोचा की वापस आ कर इसे खूब प्यार करेगे ,इसकी तबियत ठीक नही है और हम इसे समय दे नही पा रहे है। ताजा चेनल से निकलते ही हमने अपनी मित्र को फोन किया और कहा कि  आज हम जा नही पायेगे।   3.30 पर वापस घर आये तो वो हमको फिर दरवाजे पर मिली। हमने अपना बैग टेबल पर रखा और कुल्फी के पास जमीन पर बैठ गए उसे सहलाया,पुचकारा । प्यार करते समय हमने उससे कहा कि "कुल्फी कल हम तुमको नहलायेगे।" हम उसको रविवार को नहलाया करते थे जिसकी वजह से रविवार को सुबह हम कही जाते नही थे । जब भी उसको नहलाते वो बहुत खुश होती क्योंकी इस दौरान हम उसको बहुत प्यार करते थे और वो एक आज्ञाकारी बच्चें की तरह नहाते समय सारी बातें मानती। उससे बात करने के बाद हमने खाना खाया और सो गये। लगभग पांच बजे मेरा बड़ा बेटा भागता हुआ आया और बोला "मम्मी देखों कुल्फी को क्या हुआ है?  हमने जाकर देखा , वो सर उठाकर हाफ रही थी । उसके सर को हाथों में लेकर हम सहलाने लगे तो वो निढाल हो गयी , उसकी ये स्थिति देखते ही मेरे मुंह से निकला -" ये तो गयी।" तुरंत गंगा जल मगवाया उसके मुंह में डाला कुछ मुंह के अन्दर गया कुछ बाहर आया और उसने हाथों में ही दम  तोड़ दिया।  इसे संयोंग कहे या विडम्बना कि    26 मार्च 2005 में  शनिवार  के दिन  मेरी बेटी शुभ्रा पांच बजकर तीस मिनट पर ( 5.30 )  कुल्फी को  अपने जन्म दिन के तोहफे (उसके दादा जी ने दिया था)  के रूप में लायी थी  । उस दिन पाँच बजकर तीस मिनट पर वो घर के अन्दर आयी थी सारा घर उसे लेकर खुश था और आज शनिवार के दिन ठीक पांच बजकर तीस मिनट पर वो हम सबको छोड़ कर चली गयी।  उसकी आँखे सांसे सब बंद हो गयी किन्तु स्मृति कोष के पन्ने पलट गयी। वो एक महीने की नन्ही सी जान अपनी माँ से दूर होने के कारण रात में कूं कूं कर रोती तो उसका रोना सुन हम उसे बिस्तर में अपने पास सुला लेते । धीरे -धीरे उसकी आदत हम दोनों पति-पत्नी के बीच में सोने की हो गयी। जब कभी कोई बिस्तर पर सुलाने को लेकर टोकता तो हम कहते ये मेरा चौथा बच्चा है। जिसे सुनकर अक्सर मेरी ननदें कहती शकुन तुम्हारे इस चौथे बच्चे की हम बुआ नही है । कालांतर में रिश्तेदारों ने भी उसे हमारे परिवार का हिस्सा मान लिया। 



गाड़ी  के अंदर से ही हम लोगो का इंतजार करती कुल्फी 

पुरी के समुद्र तट पर  लहरों  का आनंद उठाती  कुल्फी

ब्रह्मपुत्र  नदी के किनारे बने भुवनेश्वरी मंदिर  के प्रांगण   में 
बैठ कर प्रकृति का आनंद  उठाती कुल्फी  
यादों के परत दर  परत  खुल रहे थे लेकिन अब बारी थी उसके क्रियाकर्म की । उसे सड़क पर नगरनिगम के भरोसे डाल नही सकते थे और कोई जगह थी नही जहाँ उसे दफनाते अतः उसके डाक्टर से बात की जिसने बताया की कुत्ते और बिल्लियों के लिए भी खिद्दीरपुर के पास गंगा के किनारे  शव गाह है । डाक्टर ने साथ ही अपने कर्मचारी को भेजा जो मेरे बेटों के साथ शवगाह गया और वहां मौजूद लोगो ने उसे दफनाया।  उसकी मृत्यु के दौरान देखा कि भोली जो हर समय उसे परेशान करती थी उसकी वजह से हम उसे घर से निकलने के पहले अपने बेड रूम में बंद करके जाते ताकि भोली मेरी गैर मौजूदगी में उसे तंग ना करे आज वही भोली (लेब्रा) पागलों की तरह उसके पास बार -बार आ रही है उसकों चाटने की कोशिश कर रही है जबकि हम लोग उसे हटा रहे थे। जब कुल्फी मर गयी तो उसके शव के पास आकर उसे चाटना आरंभ कर दी। हमने उसे अपने पास बुलाया उसे समझाया कि कुल्फी मर गयी है। जैसे ही उसे दफ़नाने के लिए घर से  ले जाया गया भोली छट पटा ने लगी , इन लोगो के गेट से बाहर निकलते ही उसने रोना शुरू कर दिया । ये मेरे लिए एक अलग ही अनुभव था उसे अपने पास लाकर खूब प्यार किया ,खाना दिया लेकिन उसने खाया नही वरन वो और हमारी बिल्लियाँ एक लाइन से सीढियों पर बैठ कर मेरे बेटों का इंतजार  कर रही थी कि शायद ये लोग कुल्फी को वापस  लेकर आ जायेंगे। उन्हें खाली हाथ आया देख बिल्लियाँ सीढियों से उठकर इधर उधर चली गयी। अक्सर सुनते थे कि जानवरों के भावनाएं नही होती लेकिन जानवरों की  भावनाएं स्वार्थ रहित ,प्यार में पगी हुयी होती है जो की हम इंसानों के पास नही होती।


राजधानी में यात्रा के दौरान कुल्फी 

कुल्फी और   किट्टा ( बिल्ली ) 

केक काटने की तैयारी में कुल्फी रानी