गुरुवार, 30 अप्रैल 2020
KUFFU, 'I am SO SWEET': इनके बिना जिंदगी नहीं
KUFFU, 'I am SO SWEET': इनके बिना जिंदगी नहीं: कब्बू अपने बच्चे के साथ कहते है चलने से शुगर कम होती है ये सच भी है क्योंकि मेरी शुगर लगभग नॉर्मल रहती है पर ताज्जुब तो तब हुआ जब...
KUFFU, 'I am SO SWEET': एक जिम्मेदार माँ कब्बू
KUFFU, 'I am SO SWEET': एक जिम्मेदार माँ कब्बू: ऐसी की हवा नन्हे बच्चों को बीमार कर देगी इस अंदाज में कब्बू की मुँख भंगिमा मां बनते ही कब्बू के अंदर हमने जबरदस्त बदलाव देखा। अब...
KUFFU, 'I am SO SWEET': Bholi
KUFFU, 'I am SO SWEET': Bholi: आखिर भोली माँ बन गयी भोली के सात नवजात बच्चे भोली मां बनने वाली है ये ख्याल ही मन को पुलकित कर जा रहा था डाक्टर ने 21 सितम्बर ...
KUFFU, 'I am SO SWEET': कब्बू के किश्तों में बच्चें
KUFFU, 'I am SO SWEET': कब्बू के किश्तों में बच्चें: पहली बार हमने किसी बिल्ली को किश्तों में बच्चे देते देखा ... कब्बू सीधी सादी, सबसे डर के रहने वाली नन्ही सी कब्बू अचानक पेट फ...
KUFFU, 'I am SO SWEET': एक जिम्मेदार माँ कब्बू
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KUFFU, 'I am SO SWEET': अगला पल, और नन्ही सी जान
KUFFU, 'I am SO SWEET': अगला पल, और नन्ही सी जान: अगले पल, क्या ? कल्ली डोरमैट पर एक नन्हे से बच्चे को लेकर बैठी थी, दरवाजा खुलते ही उसने हमको देखा और बड़े ही कातर स्वर...
सोमवार, 27 अप्रैल 2020
कब्बू के किश्तों में बच्चें
KUFFU, 'I am SO SWEET': कब्बू के किश्तों में बच्चें कब्बू सीधी सादी, सबसे डर के रहने वाली नन्ही सी कब्बू अचानक पेट फूला कर घूमने लगी तब हमें लगा कि ये तो बड़ी...
रविवार, 26 अप्रैल 2020
एक जिम्मेदार माँ कब्बू
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ऐसी की हवा नन्हे बच्चों को बीमार कर देगी इस अंदाज में कब्बू की मुँख भंगिमा |
मां बनते ही कब्बू के अंदर हमने जबरदस्त बदलाव देखा। अब वो पहले वाली निरीह, मासूम दूसरी बिल्लियों से डरकर भागने वाली, मेरी गोद में दुबक कर बैठने वाली कब्बू नहीं थी वरन् अब वो एक जिम्मेदार मां थी। अब वो अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए भोली - दृष्टा जैसे बड़े कुत्तों से भी भिड़ जाती थी।
मेरे घर का अतिथि कक्ष, अतिथियों के लिए कम कुत्तों - बिल्लियों के जच्चा - बच्चा केंद्र में बदल चुका था और उस कक्ष की एकमात्र सेविका हम बन चुके थे। भोली ने भी जब बच्चे दिए थे तब हमको दो महीने तक उसकी सेवा - सुश्रसा करनी पड़ी थी। वो देवी जीं हमको देखकर समझ चुकी थी कि हम उसके बच्चों की आया है अतः अगर उसका कोई बच्चा इधर से उधर हो जाता तो वो हमको आवाज लगाती, अगर कोई बच्चा दूध नहीं पी पाता तो देवी जी हमी से अनुनय करती कि हम उसके बच्चों को दूध पिलाएं। अगर भोली का दूध नहीं हो रहा है तो उनको बोतल से दूध पिलाना पड़ता थोड़ा बड़े होने पर सेरेलक खिलाना होता और वो देवी जी अपने चारों पैर फैलाकर सोती रहती। इधर कब्बू ने भी जबसे बच्चे दिए है वो यही चाहती है कि हम उसके बच्चों को सुरक्षा तो पूरी दे लेकिन गोद में न ले। बच्चे की जरा सी आवाज से वो व्यथित हो जाती है। और बड़े ही कातर भाव से विनय करती है कि हम उसके बच्चों को तंग न करे। बच्चों का बिस्तर गीला हो जाता तो हमे अपनी आवाज में बताती की हम उसका बिस्तर बदले। बच्चे अगर सो रहे है और दो घंटे से दूध नहीं पिया तो कब्बी उन्हें एक अलग ही आवाज में उठाती अगर वे नहीं जागते तो उन्हें चाट -चाट कर उठाती और दूध पिलाती। बाहर वो तभी जाती जब उसे सूसू -पॉटी करना होता। यहीं नहीं जबसे उन्होंने चलना आरंभ किया है तब से वो मेरे लिए सरदर्द है । बिस्तर से गिरे नहीं, किसी अलमारी - टेबल के कोने में न फस जाए । अतः उनकी सुरक्षा के लिए तकियों को लगाकर चारों तरफ दीवार उठा दी। एक दिन बच्चे अपनी बाउंड्री वाल के अंदर उछल - कूद मचा रहे थे, हमनें एक बच्चे को उठाया और बाउंड्री वाल के बाहर रख दिया। कब्बू उसको दूध पिलाने लगी। सहसा हम किसी काम से कमरे के बाहर निकल गए लौट कर जब आये तो देखते है कि कब्बू बाउंडरी वाल के अंदर अपने बच्चे के साथ बैठी हुयी है। ये देखकर हम समझ गए कि कब्बू रानी बच्चों की सुरक्षा के प्रति बहुत गंभीर है। इधर जैसे जैसे गर्मी बढ़ती जा रही थी कब्बू बिस्तर छोड़ कर जमीन पर सोने लगी। किन्तु बच्चों को बिस्तर पर ही रखती। एक दिन रात में बहुत उमस थी हमने ऐसी चालू कर दिया। बाप रे कब्बू ने दयनीय आवाज निकाल कर अपना मुंह ऐसी की तरफ उठाया जैसे कह रही हो इसकी हवा मेरे बच्चों को बीमार कर देगी। हमने ऐसी थोड़ी देर बंद रखा जैसे ही दुबारा चालू किया उसने फिर रोना आरम्भ कर दिया नतीजा हमे पंखे की हवा में ही सोना पड़ा।
रविवार, 19 अप्रैल 2020
इनके बिना जिंदगी नहीं
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कब्बू अपने बच्चे के साथ |
कहते है चलने से शुगर कम होती है ये सच भी है क्योंकि मेरी शुगर लगभग नॉर्मल रहती है पर ताज्जुब तो तब हुआ जब लगभग ढाई किलोमीटर चल कर आने के बाद घर में बैठे और कमजोरी महसूस हुई। सोचा शुगर फॉल कर गई होगी चेक किया तो 402। आश्चर्य तो अवश्य हुआ लेकिन नजर अंदाज कर दिया। दूसरे दिन इंफेक्शन का आभास हुआ तो हमने में अपने बेटे से पूछा कि गणेश ( रेस्टोरेंट का सेकंड कुक) को क्या यही बीमारी हुई थी उसने जवाब दिया मुंह तो उसका भी फूला हुआ था। अगला प्रश्न की उसे किस डाक्टर को दिखाया तो पता चला कि दूसरे एम्प्लोई ने सी एम डी हॉल के पास बैठने वाले डाक्टर को दिखाया था जो 100 रुपए फीस लेता है उसकी दवाई से उसे आराम मिला है वैसे गणेश अभी छुट्टी पर है इसलिए कितना ठीक हुआ कहना मुश्किल है। मुझे लगा जब उसे आराम मिल सकता है तो हमे क्यों नहीं हमने भी 100 रुपए फीस पर डाक्टर को दिखाया और खुश होकर घर आ गए । दूसरे दिन चेहरा कुछ और ही हो गया। मजबूरन फैमिली डाक्टर के पास गए वो देखते ही बोले " हर्पीज जोस्टर" पता चला कि कभी बचपन में चिकीन पौक़्स हुई होगी उसी के जर्म्स फिर से सक्रिय हो गए है। डाक्टर ने सावधानी रखने को कहा और समझाया 6 महीने तक दर्द झेलना पड़ेगा। " हुईए सोई जो राम रच राखा " सोच कर घर आये । दवाइयां आ चुकी थी उन्हें समझ रहे थे कि तभी पतिदेव ने प्रवेश किया और चालू हो गए " कितनी बार समझाया की बिल्लियों को बिस्तर पर मत बिठाया करो ये अपने साथ कितनी बीमारियों को लेकर आती है लेकिन तुम्हे तो इन्हे अपने साथ सुलाना है, इनके मुंह से मुंह चिपका लेती हो, हम भी तो कुत्तों को प्यार करते है लेकिन उसके बाद हाथ धोते है।" मुझे लगा कि क्या ये सहानुभूति है , हमदर्दी है, डर है, चिंता है या विपक्ष की तरह मोदी पर हमला बोलने के लिए मौके की तलाश की तर्ज पर आक्रमण। हमने भी अपना फैसला सुना दिया " बिल्लियां घर से बाहर नहीं जाएगी " और दूसरे कमरे में शिफ्ट हो गए। लेकिन इंफेक्शन को रोकने के लिए डाक्टर के अनुसार कुत्ते बिल्ली, बच्चा सबसे दूर भी रहना था।
बीमारी कि जब चर्चा हुई तो सबने अपने अपने अनुसार बीमारी का नाम और ठीक होने के नुस्खे बताना आरंभ कर दिया, जिसमें एक नाम था गलफुल्ली माता।
अब दूसरा आदेश पारित हुआ जब तक बीमार हो तुम कुत्ते और बिल्लियों को चिकिन नहीं दोगी। ये मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था क्योंकि दो कुत्ते और दस बिल्लियों को खाना हिसाब से देना होता है ताकि कोई भूखा न रहे ये काम हम तब भी किसी के ऊपर नहीं छोड़ते जब हमारे यहां नवरात्रि में कलश स्थापना होती है और मेरा उपवास भी रहता है। सबसे ज्यादा सोचना पड़ता है अपनी दो पालतू बिल्लियों कोलू और ढिंकु के लिए क्योंकि वे संस्कारी और अनुशासित बिल्लियां है जंगली बिल्लियों की तरह छीन झपट कर खाना उन्हें नहीं आता। हमने अपने बेटे को समझाया कि कैसे खाना देना है लेकिन वो छत पर सभी बिल्लियों के लिए खाना डाल आया और कुत्तों को अंदर वाली छत पर दे दिया नतीजा मेरी कोलू - धिंकु भूखी रह गई। बीमारी हालत में ही उठकर उन लोगो को दूध दिया। मन ही मन तय कर लिया कि इनकी भूख के साथ समझौता नहीं करेंगे और उसी दिन से इन लोगो को पहले की तरह से खाना देना आरंभ कर दिया। इधर कोलू जो मेरे संग रोज सोती थी इंफेक्शन बढ़ने के डर से साथ सुलाना बंद कर दिया। वो बेचारी दरवाजे के बाहर खड़ी होकर रोती। उसकी ये दशा हमसे देखी नहीं गई, "भाड़ में गया इंफेक्शन" दरवाजा खोल कर उसे अंदर कर लिया। वो बेचारी सर्दी के मारे इतनी सिकुड़ गई थी कि पूरी रात मेरी रजाई के अंदर हमसे चिपक कर सोती रही। बीमार हुए हमें 14 दिन हो गए इंफेक्शन ठीक होने में समय लग रहा है लेकिन मेरे मूक बच्चे खुश है क्योंकि उन्हें मेरा प्यार मिल रहा है।
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